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कौन है बेहतर और सुरक्षित: iOS या Android ...

एक्सपर्ट से समझें

इस समय स्मार्टफोन बाजार में दो ही ऑपरेटिंग सिस्टम चल रहे हैं। पहला एपल का आईओएस और दूसरा गूगल का एंड्रॉयड। एंड्रॉयड के यूजर्स की संख्या आईफोन के मुकाबले ज्यादा है। यह सवाल काफी पुराना है कि एंड्रॉयड और आईफोन में बेहतर कौन है। कई बार सिक्योरिटी को लेकर बात होती है तो कई बार परफॉर्मेंस को। आज हम इस रिपोर्ट में बात करेंगे कि आईफोन एंड्रॉयड से कितना अलग है और कितना सुरक्षित? इसके लिए अमर उजाला ने साइबर मीडिया रिसर्च (CMR) के इंडस्ट्री इंटेलिजेंस ग्रुप के प्रमुख प्रभु राम से बात की है। सबसे पहले परफॉर्मेंस की बात करें तो आईफोन की परफॉर्मेंस सभी को पता है, हालांकि अब बेहतर परफॉर्मेंस वाले एंड्रॉयड स्मार्टफोन भी बाजार में मौजूद हैं, लेकिन आईफोन के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि आईफोन शायद ही हैंग होता है, जबकि एंड्रॉयड में कुछ समय बाद हैंग होने की समस्या आने लगती है। एपल का ऑपरेटिंग सिस्टम आईओएस, एंड्रॉयड के मुकाबले काफी स्मूथ है और आईफोन का प्रोसेसर, ग्राफिक्स भी कई मामले में एंड्रॉयड के मुकाबले तेज ही होता है।

सॉफ्टवेयर के मामले में कौन कितने पानी में

बात आईफोन के सॉफ्टवेयर की करें तो सबसे बड़ी बात यह है कि एपल करीब 5 साल पुराने आईफोन के लिए भी अपडेट जारी करता है, जबकि एंड्रॉयड के साथ ऐसा नहीं है। एंड्रॉयड में अधिकतम आपको दो साल तक सॉफ्टवेयर अपडेट मिलता है। एपल की एनीमोजी कमाल की है। आईओएस 13 इस वक्त सबसे फास्ट ऑपरेटिंग सिस्टम है। आपको जानकर हैरानी होगी कि एपल के फुल टाइम एक्सपर्ट्स हैं जो बेहतरीन एप्स का चुनाव करते हैं। प्रभु राम ने सॉफ्टवेयर और एप को लेकर बताया कि एपल के एप-स्टोर पर एप के पब्लिश होने से पहले बारिकी से चेक किया जाता है, जबकि एंड्रॉयड के साथ ऐसा नहीं है। ऐसे में एंड्रॉयड फोन में किसी मैलवेयर के पहुंचने की संभावना आईफोन के मुकाबले अधिक होती है। 

प्राइवेसी और सिक्योरिटी

स्मार्टफोन की प्राइवेसी और सिक्योरिटी की बात हो और आईफोन की चर्चा ना हो, यह संभव ही नहीं है। एपल अपने यूजर्स की प्राइवेसी को लेकर कितना गंभीर रहती है इसका अंदाजा आप साल 2016 में पाकिस्तानी मूल के आतंकवादी सैयद फारूख ने कैलिफोर्निया में गोलीबारी की वारदात को अंजाम दिया था, जिसमें 14 लोगों की जान चली गई थी। घटना के बाद आतंकी का आईफोन अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई के हाथ लगा जिसे अनलॉक करने के लिए एजेंसी ने एपल से मदद मांगी थी लेकिन एपल ने आईफोन को अनलॉक करने से मना कर दिया था। एपल ने कहा था कि वह यूजर्स की प्राइवेसी से समझौता नहीं करेगी।

तो एपल की सिक्योरिटी एंड्रॉयड के मुकाबले बहुत अधिक है। कई एंड्रॉयड फोन की फेस आईडी को फोटो के जरिए भी खोलने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है, लेकिन आईफोन के साथ ऐसा नहीं है। एपल ने अब आईफोन में टच आईडी खत्म करके फेस आईडी दे दी है जो कि काफी फास्ट और सिक्योर है। आईफोन की सिक्योरिटी को लेकर प्रभु राम ने बताया, 'एपल के पास सॉफ्टवेयर से लेकर एप तक सभी कंट्रोल रहता है। सिक्योरिटी और प्राइवेसी किसी भी मोबाइल के दो प्रमुख पहलू हैं। डाटा सिक्योरिटी को लेकर एपल कोई समझौता नहीं करती है। एपल के पास प्राइवेसी और सिक्योरिटी के लिए खास आर्किटेक्चर हैं।'

एंड्रॉयड और आईफोन की सिक्योरिटी में कितना अंतर?

प्रभु राम ने एंड्रॉयड और आईफोन की सिक्टोरिटी में अंतर को लेकर कहा, 'आईफोन के आईओएस के मुकाबले एंड्रॉयड को काफी ओपन और फ्लेक्सिबल (लचीला) जिससे डेवलपर्स और यूजर्स को कई सारे फायदे मिलते हैं, लेकिन जब किसी मैलवेयर के फोन में पहुंचने की बात होती है तो एंड्रॉयड कमजोर पड़ जाता है, क्योंकि एपल जब कोई अपडेट जारी करता है तो वह तुरंत यूजर्स को मिलता है, जबकि एंड्रॉयड का अपडेट यूजर्स को तुरंत नहीं मिलता है, क्योंकि तमाम एंड्रॉयड मोबाइल निर्माता कंपनियां अपने फोन में कस्टम यूजर इंटरफेस (अपना यूआई) देती हैं। ऐसे में गूगल द्वारा अपडेट जारी करने के बाद भी यूजर्स को जल्दी अपडेट नहीं मिल पाता है। ऐसे एंड्रॉयड मोबाइल की संख्या लाखों में है जिन्हें नया अपडेट नहीं मिला है।'

आईफोन में वायरस आने के कितना खतरा है?

आईफोन में किसी मैलवेयर के पहुंचने के सवाल पर प्रभु राम का कहना है कि आईफोन की सिक्योरिटी एक बंद एक बगीचे की तरह है जिसके चारों और मजबूत दीवारें हैं। ये दीवारों एप्स और ऑपरेटिंग सिस्टम के बीच हैं। एपल सभी तरह के थर्ड पार्टी एप को बारीकी से जांच करता है और उसके बाद ही एप को एपल के एप स्टोर पर पब्लिश किया जाता है। ऐसे में किसी आईफोन में मैलवेयर के पहुंचने की संभावनी जीरो रह जाती है।

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